समस्त रोगोंकी अमृत दवा-त्रिफला

Jul 05, 2021

‌‌(डॉ० श्रीराजीवजी प्रचण्डिया, एम०ए० (संस्कृत), बी०एस्-सी०, एल-एल्०बी०, पी-एच०डी० )‌‌आरोग्य अङ्क - गीता प्रेस् (४२३ पृ या ३८८ पृ. । विभिन्न संस्करणोंके अनुसार)

आजकल मनुष्य प्रकृतिसे जितना दूर होता जा रहा है, उतना ही वह विभिन्न रोगोंसे घिरता जा रहा है। वर्तमानकी अपेक्षा पहलेके लोग ज्यादा स्वस्थ तथा सुखी होते थे, क्योंकि वे अथक परिश्रम करते, शुद्ध आहार ग्रहण करते तथा स्वच्छ रहते थे। उनका जीवन सादगीसे अनुप्राणित था। इसलिये वे स्वस्थ एवं दीर्घजीवी थे, किंतु आजके मनुष्य-जीवनमें इनका अभाव दीख रहा है।

स्वस्थ तथा दीर्घ आयुतक जीनेके लिये एक बहुश्रुत पदार्थ है-त्रिफला। यदि कोई व्यक्ति त्रिफलाका नियमित रूपसे निर्दिष्ट नियमोंके आधारपर निरन्तर बारह वर्षोंतक सेवन करता रहे तो उसका जीवन सभी तरहके रोगोंसे मुक्त रहेगा। ओज उसके जीवनमें प्रतिबिम्बित हो उठेगा। वह स्वस्थ तो रहेगा ही, दीर्घ जविन भी प्राप्त करेगा। विभिन्न औषधियोंसे वह सर्वदाके लिये अपना पिण्ड छुड़ा लेगा, क्योंकि त्रिफला रोगोंकी एक अमृत दवा है। इसका कोई ‘वाई-इफेक्ट्स' नहीं पड़ता।

त्रिफलामें तीन पदार्थ हैं- १-आँवला, २-बहेड़ा और ३-पीली हरड़। इन तीनोंका सम्मिश्रण त्रिफला कहलाता है। आँवला, बहेड़ा और पीली हरड़से भला कौन अपरिचित है? ये तीनों पदार्थ सहजमें ही मिल जाते हैं। इन्हें प्राप्तकर घरपर ही त्रिफलाका निर्माण किया जा सकता है। त्रिफला बनानेकी विधि इस प्रकार है --

त्रिफलाके लिये इन तीनों पदार्थोंके सम्मिश्रणका एक निश्चित अनुपात है। यह इस प्रकार है-पीली हरड़का चूर्ण एक भाग, बहेड़ेके चूर्णका दो भाग और आँवलेके चूर्णका तीन भाग। इन तीनों फलोंकी गुठली निकालकर खरल आदिमें कूट-पीसकर चूर्णका मिश्रण तैयार कर लें। यह मिश्रण काँचकी बोतलमें कार्क लगाकर रख दें, ताकि बरसाती हवा इसमें न पहुँच सके। चार माहकी अवधि बीत जानेपर बना हुआ चूर्ण काममें नहीं लेना चाहिये, क्योंकि यह उतना उपयोगी नहीं रह पाता है जितना होना चाहिये।

त्रिफलाके सेवनकी विधिका भी हमें ज्ञान होना चाहिये। त्रिफला बारह वर्षतक नित्य और नियमित रूपसे विधिवत् प्रातः बिना कुछ खाये-पिये ताजे पानीके साथ एक बार लेना चाहिये। उसके बाद एक घंटेतक कुछ खाना-पीना नहीं चाहिये। कितनी मात्रामें यह लिया जाय, इसका भी विधान है। जितनी उम्र हो उतनी ही रत्ती लेनी चाहिये। परंतु एक बात ध्यान रहे कि इस त्रिफलाके सेवनसे एक या दो पतले दस्त होंगे किंतु इससे घबड़ाना नहीं चाहिये।

यदि यह त्रिफला प्रत्येक ऋतुमें निम्न वस्तुओंके साथ मिलाकर लिया जाय तो इसकी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि प्रत्येक ऋतुका अपना-अपना स्वभाव होता है। वर्षभरमें दो-दो माहकी छः ऋतुएँ होती हैं। त्रिफलाके साथ कौन-सी ऋतु या माहमें कौन-सा, कितनी मात्रामें पदार्थ लिया जाय, वह इस प्रकार है।

१-श्रावण और भाद्रपद यानी अगस्त और सितम्बरमें त्रिफलाको सेंधा नमकके साथ लेना चाहिये। जितना त्रिफलाका सेवन करे, सेंधा नमक उससे छठा हिस्सा ले।‌‌२-आश्विन और कार्तिक यानी अक्टूबर तथा नवम्बरमें त्रिफलाको शक्कर या चीनीके साथ त्रिफलाकी खुराकसे छठा भाग मिलाकर सेवन करना चाहिये।‌‌३-मार्गशीर्ष और पौष यानी दिसम्बर तथा जनवरीमें त्रिफलाको सोंठके चूर्णके साथ लेना चाहिये। सोंठका चूर्ण त्रिफलाकी मात्रासे छठा भाग हो।‌‌४-माघ तथा फाल्गुन यानी फरवरी और मार्चमें त्रिफलाको लैण्डी पीपलके चूर्णके साथ सेवन करना चाहिये। यह चूर्ण त्रिफलाकी मात्राके छठे भागसे कम हो।‌‌५-चैत्र और वैशाख यानी अप्रैल तथा मईमें त्रिफलाका सेवन त्रिफलाके छठे भाग जिला मिलाकर करना चाहिये।‌‌६-ज्येष्ठ तथा आषाढ़ यानी जून और जुलाईमे त्रिफलाको गुड़के साथ लेना चाहिये। त्रिफलाको छठा भाग गुड़ होना चाहिये।

जो व्यक्ति इस क्रम और विधिसे त्रिफलाकर सेवन करता है, उसे निश्चित रूपसे बहविध लाभ होता है। उसका एक प्रकारसे काया-कल्प हो जाता है। पहले वर्षमें यह तनकी सुस्ती, आलस्य आदिको दूर करता है। दूसरे वर्षमें व्यक्ति सब प्रकारले रोगोंसे मुक्ति पा लेता है अर्थात् सारे रोग मिट जाते हैं। तीसरे वर्षमें नेत्र-ज्योति बढ़ने लगती है। चौथे वर्षमें शरीरमें सुन्दरता आने लगती है। शरीर कान्ति तथा ओजसे ओतप्रोत रहता है। पाँचवें वर्षमें बुद्धिका विशेष विकास होने लगता है। छठे वर्षमें शरीर बलशाली होने लगता है। सातवें वर्षमें केशराशि यानी बाल काले होने लगते हैं। आठवें वर्षमें शरीरको वृद्धता तरुणाईमें बदलने लगती है। नवें वर्षमें व्यक्तिकी नेत्रज्योति विशेष शक्ति-सम्पन्न हो जाती है। दसवें वर्षमें व्यक्तिके कण्ठपर शारदा विराजने लगती हैं। ग्यारहवें और बारहवें वर्षमें व्यक्तिको वाक्-सिद्धिकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार बारह वर्षतक निरन्तर उपर्युक्त विधिसे त्रिफलाका सेवन करनेके उपरान्त व्यक्ति व्यक्ति न रहकर परम साधक बन जाता है। क्योंकि उसका समस्त मनोवृत्तियाँ स्वस्थ तथा सात्त्विक हो जाता है।

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