शिक्षा नीति के परिवर्तन सूत्र

Feb 22, 2021

राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भारत की केन्द्रीय मंत्री परिषद ने 29 जुलाई 2020 को पारित किया। नीति में ऐसे अनेक बिंदु हैं जो आमूलचूल परिवर्तन के कारक बन सकते हैं। इन बीज बिंदुओं की सूची प्रस्तुत है। हम सब इस पर कार्य योजना बनाएँ।

1. नाम परिवर्तन - केन्द्रीय मंत्रालय का नाम पुनः एक बार शिक्षा मंत्रालय किया गया है। (25.2)भारतीयता के भाव को ध्यान में रखते हुए हम इस परिवर्तन का स्वागत करते हैं। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, दृष्टि परिवर्तन है। यह बाजार के लिए सक्षम मजदूरों (मानव संसाधन) को तैयार करने के स्थान पर मानव निर्माण, चरित्र निर्माण और समग्र व्यक्तित्व विकास के शिक्षा के मूल उद्देश्य प्राप्ति की ओर लौटेगा। आगे सुझाव यह है कि संस्कृति भी जोड़ा जाएँ। स्वतंत्रता के समय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय ही था। वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत लगभग 150 ऐसे संस्थान हैं जो कला शिक्षा के कार्य में संलग्न हैं। दोनों मंत्रालय साथ जुड़ने से शिक्षा एवं संस्कार का कार्य अधिक परिणामकारी और परिपूर्ण होगा। कलाओं के लिए अलग मंत्रालय रखना आवश्यक लगता ही है तो उसका नाम बदलकर ‘कला एवं सौदर्यबोध मंत्रालय – Ministry of Arts & Aesthetics’ रखा जाएँ ताकि संस्कृति का अर्थ केवल नृत्य, संगीत से जोड़कर ना समझा जाएँ।

2. भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (एचईसीआय) - अनेक वर्षों से शिक्षा क्षेत्र की माँग रही है कि शिक्षा का प्रबंधन और संचालन शिक्षकों तथा शिक्षाविदों के हाथ में होना चाहिए। इस हेतु शैक्षिक संगठनों की मांग रही है कि एक शक्तिशाली स्वायत्त ‘राष्ट्रीय शिक्षा आयोग’ की स्थापना की जाएँ। इस नीति में भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग की अनुशंसा की गई है। (18.2) आयोग का स्वरूप अधिक स्वायत्त, शक्तिशाली हो इस हेतु शिक्षाविदों का सहभाग बढ़ाया जाएँ। वर्तमान स्वरूप में एचईसीआय एक स्वतंत्र निकाय होगा जिनमें प्रासंगिक क्षेत्रों में काम कर रहे सत्यनिष्ठ, प्रतिबद्ध उच्चतर श्रेणी के विशेषज्ञ होंगे जिनके पास सार्वजनिक सेवाओं में योगदान देने का विशिष्ट अनुभव होगा। एचईसीआय का भी खुद का अपना एक छोटा, स्वतंत्र निकाय होगा जिसमें उच्चतर शिक्षा में प्रसिद्ध सामाजिक सरोकारों वाले विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे, जो एचईसीआय की सत्यनिष्ठा और प्रभावी कार्यकुशलता को संचालित करेंगे और इसकी निगरानी करेंगे। (18.10) आयोग का कार्य केवल सुझाव देनेवाला ना होकर कार्यपालिका (Executive) के रूप में है तथा सभी नियंत्रक इसके अधीन हैं। राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान उपाध्यक्ष होने से आयोग अधिक स्वायत्त होगा।

3. लचीलापन – शिक्षा की संरचना में लचीलापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति में 5+3+3+4 की रचना प्रस्तुत की है। (4.1)पूर्व प्राथमिक शिक्षा को भी जोड़ा गया है। 9-12 को एकत्र सोचा गया है। इस स्तर पर विषय चुनाव में लचीले विकल्प प्रदान किए गए हैं। विज्ञान, वाणिज्य, कला शाखाओं के भेद को मिटाकर मिश्रित विषय चयन का विकल्प भी रखा गया है। (4.9) इस प्रावधान के लागू होने से शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा। उच्च शिक्षा में भी स्नातक पूर्व और स्नातक शिक्षा का प्रावधान रखा है। Multiple exitका प्रावधान भी है । उसका स्वरूप शिक्षण मंडल के प्रारूप में विस्तार से दिया गया था। उसे अक्षरशः स्वीकार किया गया है। प्रथम वर्ष की शिक्षा पूरी करने पर यदि किसी को अध्ययन छोड़ना पड़ा तो उसे प्रमाणपत्र मिलेगा। द्वितीय वर्ष की शिक्षा पूर्ण करने पर पदविका अर्थात डिप्लोमा तथा 3 वर्ष पूर्ण करने पर पदवी (डिग्री) प्राप्त होगी। 4 वर्ष के अध्ययन के बाद सम्मान पदवी (ऑनर्स डिग्री)। जिसने सामान्य पदवी प्राप्त की हो उसे 2 वर्ष का परास्नातक (post-graduation) और जिसने 4 वर्ष की ऑनर्स डिग्री प्राप्त की हो उसे 1 वर्ष का परास्नातक पाठ्यक्रम करना पड़ेगा। (11.9) इसी के साथ ऐकेडेमिक क्रेडिट बैंक की स्थापना की भी व्यवस्था की गई है जो स्वागत योग्य है। इस लचीलेपन से अपनी अभिरुचि के अनुसार आजीविका चयन संभव होगा। सभी प्रकार के उद्यम, श्रम, व्यवसाय, कलाओं को समान सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्राप्त होगी।

4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति - प्रारंभ में 2015 जनवरी में जब शिक्षा नीति पर कार्य प्रारंभ हुआ तब इसे ‘नई शिक्षा नीति’ कहा गया था। भारतीय शिक्षण मंडल ने लगातार यह बात समाज और सरकार के सामने रखी कि हर 10-15 वर्ष बाद नई शिक्षा नीति आ ही जाती है किंतु यदि वास्तविक अर्थ में हम शिक्षा में दूरगामी परिवर्तन करना चाहते हैं तो इस बार शिक्षा की नीति को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ कहा जाना अधिक उचित है। कस्तूरीरंगन समिति को शिक्षा नीति के प्रारूप लेखन का दायित्व देते समय सरकार ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ शब्द प्रयोग किया। इस समिति ने भी सही अर्थ में राष्ट्रीय प्रारूप समाज के सम्मुख रखा है।यह कई आयामों में सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय प्रारूप है। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में व्यापक रूप से लोगों का सहभाग लिया गया।ढाई लाख से अधिक गांवों में शिक्षा नीति पर चर्चा की गई। सांस्कृतिक अर्थ में भी यह शिक्षा नीति राष्ट्रीय है। भारत की मौलिक विचारधारा के अनुरूप अनेक बातें शिक्षा नीति में हमें दिखाई देती है। पुरानी विदेशी शिक्षा नीति को पूर्णतः परिवर्तित कर भारत केंद्रित, राष्ट्र निर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की नींव इस में हम स्पष्ट देख सकते हैं। उस अर्थ में भी यह शिक्षा नीति राष्ट्रीय है। (परिचय, पृ. सं. 4-7)

5. भारतीय भाषा – शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व को अधोरेखित अवश्य किया है।उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो ऐसी अनुशंसा नीति करती है।यह क्रांतिकारी सुधार हो सकता है। अभियांत्रिकी, चिकित्सा जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों सहित सभी पाठ्यक्रमों में भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक है। इससे प्राथमिक कक्षाओं में भारतीय भाषाओं का महत्व बढ़ जाएगा। (22.9 से 11) पूर्व प्राथमिक एवं प्राथमिक स्तर पर प्रथम भाषा अथवा मातृभाषा भी शिक्षा का माध्यम हो यह बात शालेय शिक्षा के अध्याय में भी है। (4.11) संस्कृत केवल अनेक भाषाओं में से एक न होकर सभी भाषाओं के शुद्ध अध्ययन में उसका महत्व सर्वविदित है। (4.17) इस बिंदु को शिक्षा नीति की प्रस्तावना एवं भाषा वाले अध्याय में तो लिखा है किन्तु त्रिभाषा सूत्र (4.13) को लागू करने से सर्वाधिक अन्याय संस्कृत के साथ ही होता है। प्रादेशिक भाषा और अंग्रेजी अनिवार्य हो जाती है तथा अहिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दी का आग्रह करने पर संस्कृत बाहर हो जाती है। अतः त्रिभाषा सूत्र के अलावा संस्कृत को भाषा विज्ञान की नींव मानकर योग के समान पूर्व प्राथमिक से आठवी कक्षा तक अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएँ।

6. National Research Foundation (NRF) - राष्ट्रीय अनुसंधान न्यास एक क्रांतिकारी संकल्पना है (17.9) जिसके अंतर्गत उच्च शिक्षा में अनुसंधान को नई गति मिलेगी।इससे समाजोपयोगी, उद्देश्यपूर्ण और परिणामकारी अनुसंधान होगा। NRF की गतिविधियों में (17.11) व्रत प्रकल्प (Mission Mode Projects) के अंतर्गत कई विश्वविद्यालय राष्ट्रीय आवश्यकता के विषय पर समन्वित अनुसंधान कर सकें यह प्रावधान भी जोड़ा जाएँ। आत्मनिर्भर भारत के लिए आयात पर निर्भरता समाप्त करना अनिवार्य है। शैक्षिक जगत में शोध को बढ़ावा इस दिशा में उपयोगी होगा।

7. शिक्षक – शिक्षक के पद का महत्व भारत में हमेशा से रहा है जो गत कुछ वर्षों में कुछ प्रमाण में कम होता प्रतीत हो रहा है। शिक्षकत्व समाज में पुनः प्रतिष्ठित होगा तो समाज समर्थ बनेगा।(5.15) इस हेतु शिक्षा नीति में दो उपाय सुझाए हैं – अध्यापक शिक्षा का व्यावसायिक स्वरूप तथा अनुबंध नियुक्ति (Contract) पर पूर्ण प्रतिबंध। वर्तमान में अध्यापक बनना सबसे अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है।शिक्षा नीति में कहा है कि दो वर्ष के पाठ्यक्रम को बंद किया जाएँ और केवल चार वर्ष का एकीकृत पाठ्यक्रम चलाया जाएँ जिससे बारहवी के बाद संकल्पबद्ध छात्र (विशेषतः ग्रामीण क्षेत्र से) अध्यापन शिक्षा में प्रवेश लें। (5.2) वर्तमान में शिक्षाकर्मी, गुरुजी के नाम से जो देहाड़ी पर शिक्षक हैं, वे काम तो शिक्षक का करते हैं किन्तु वेतन बहुत कम मिलता है।अतः इस व्यवस्था को बंद करना भी स्वागत योग्य प्रस्ताव है। शिक्षक की प्रतिष्ठा बढ़ाने में यह एक प्रभावी उपाय है।

8. व्यावसायिक शिक्षा – कौशल शिक्षा के नाम पर पूरे देश में बहुत बड़ा प्रपंच खड़ा हुआ है किन्तु औपचारिक शिक्षा में उसे पर्याप्त स्थान नहीं है। शिक्षा नीति में शालेय शिक्षा (4.26) के साथ ही उच्च शिक्षा (10.8, 10.13, 11.4) में भी व्यावसायिक शिक्षा को जोड़ने का प्रावधान किया गया है।  9वी से 12वी के स्तर पर 40 विषयों में गुणांक (Credit) में से 15 व्यावसायिक शिक्षा के हैं। इस प्रकार व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य शिक्षा का भाग बनाया गया है।सोलहवे बिन्दु में पूरी तरह से व्यावसायिक शिक्षा की संरचना को सुव्यवस्थित करने के लिए 8 क्रांतिकारी प्रावधान किए गए हैं। 16.6में स्पष्ट लिखा गया है कि अगले दशक में व्यावसायिक शिक्षा को स्कूल एवं उच्चतर शिक्षा संस्थानों में एकीकृत किया जाएगा। ‘कौशल’ के स्थान पर ‘व्यावसायिक’ शब्द प्रयोग करने के कारण केवल नौकरी की मानसिकता नहीं बनती, अपितु स्वरोजगार के अंतर्गत उद्यमिता का भाव भी छात्रों में रोपित होता है।

9. पूर्ण स्वायत्तता – उच्चतर शिक्षा आयोग से प्रारंभ स्वायत्तता का विषय शिक्षा संस्थानों तक बढ़ाया गया है। उच्च शिक्षा में सभी महाविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने का प्रावधान नीति में है। (19.2)शालेय शिक्षा में भी निजी विद्यालयों तक को अपने शुल्क निर्धारण का अधिकार देने जैसा क्रांतिकारी विचार शिक्षा नीति में है। (7.1 से 7.12) केवल एक अनिवार्यता रखी गई है कि शिक्षा सेवाभाव से दी जाएँ। महाविद्यालयों को तो शैक्षिक, प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता दी गई है। स्वयं के पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी करने का अधिकार महाविद्यालयों को दिया गया है। (11.9, 10) भारतीय शिक्षण मंडल इस स्वायत्तता का स्वागत करता है किन्तु शिक्षा के व्यापारीकरण का निदान इससे नहीं होगा। अतः उस हेतु क्रांतिकारी उपाय करने की आवश्यकता है। केवल सेवार्थ शिक्षा संस्थान चलाने की बात करना ही पर्याप्त नहीं है, व्यापारिक रूप से चलनेवाले शिक्षा संस्थानों के नियंत्रण की भी सुचारु व्यवस्था करना आवश्यक है। शिक्षण मंडल का सुझाव है कि व्यापारिक संस्थान खोलने की अनुमति प्रदान की जाएँ और उसे समाज में सही ढंग से प्रगट किया जाएँ ताकि अभिभावक निर्णय कर सकें कि उन्हें सेवाभावी संस्थान में प्रवेश लेना है या व्यापारिक संस्थान में।

10.  शिक्षण विधि – वर्तमान में अध्येता केंद्रित (Learner Centric)- बालक केंद्रित (Child Centric) शिक्षा की चर्चा होती है। इस हेतु अनेक उपाय किए गए हैं। उनमें से कई तो ऐसे हैं जो शिक्षकों को विवश करने वाले हैं। अनेक शिक्षक इन उपायों से स्वयं को बंधा अनुभव करते हैं। भारत का आदर्श अध्ययन केंद्रित (Learning Centric)तथा शिक्षक आधारित (Teacher Based) शिक्षा है। इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इन दोनों बातों को महत्व दिया गया है। अध्ययन का दायित्व विद्यार्थी का है। शिक्षक तो मार्गदर्शक और सहयोग की भूमिका में होता है। 9वी कक्षा से गुणांक (Credit) व्यवस्था लगाने से अध्ययन का दायित्व छात्रों पर होगा। (4.9, 4.10) दूसरी ओर पाठ्यक्रम निर्धारण की जिम्मेवारी शिक्षकों पर दी गई है। यदि दोनों अपनी भूमिकाओं का सही निर्वाह करेंगे तो गुरुकुल जैसी आदर्श शिक्षा के निर्माण की संभावना इस बीज में है।

11.  समाज पोषण – भारत में सदैव शासन मुक्त शिक्षा व्यवस्था की बात की गई है किंतु इसका अर्थ वर्तमान के निजीकरण से नहीं रहा है। शिक्षा सदा ही समाज का दायित्व रहा है। परिचय अध्याय में नीति के मूलभूत सिद्धांतों में कहा गया है – “शिक्षा एक सार्वजनिक सेवा है।” अतः शिक्षा व्यवस्था समाजपोषित हो ऐसी अपेक्षा की जाती रही है। शिक्षा नीति में प्रशासन में समाज के सहभाग की व्यवस्था है (7.12) तथा वित्त पोषण में परोपकारी गतिविधियों को पुनर्जीवित कर धन जुटाने की बात भी कही गई है। (26.6) किंतु निजी के स्थान पर सामाजिक संस्थान की बात होना भी आवश्यक है। व्यापारी निजी शिक्षा संस्थानों के साथ सेवाभावी सामाजिक संस्थानों को भी गैर सरकारी होने के कारण निजी कहना और उनके नियंत्रण के लिए भी उसी मापदंड का प्रयोग उचित नहीं है। नीति में निजी/ परोपकारी ऐसा शब्द प्रयोग तो हुआ है (8.3, 8.4, 8.5 ख) किन्तु इनका विभाजन स्पष्ट नहीं किया गया है। इस विसंगति को दूर करने से हर स्तर पर समाज के सहभाग को बढ़ाया जा सकेगा।

12.  वित्त विपुलता – अनेक वर्षों से सभी शैक्षिक संगठन यह मांग करते रहे हैं कि शिक्षा मद में सरकारी व्यय GDP के 6% तक बढ़ाया जाएँ। इस बात का संज्ञान लेते हुए नीति में यह बात की गई है। (26.2) व्यापारिक संस्थानों को भी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के माध्यम से शिक्षा में योगदान करने का प्रावधान विधि में सुधार द्वारा करने की बात की गई है। (26.6) यदि उचित राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सुझाव को क्रियान्वित किया जाता है तो शिक्षा के क्षेत्र में विपुल मात्रा में वित्त की उपलब्धि हो सकेगी और सभी शिक्षकों को नियमित करने जैसे क्रांतिकारी उपायों को लागू किया जा सकेगा।

13.  वैश्विकता – भारत में ज्ञान के क्षेत्र में कभी सीमाओं का निर्धारण नहीं किया गया। हमारे शिक्षक सारे विश्व में शिक्षा प्रदान करते रहे हैं और सारे विश्व के जिज्ञासु भारतीय विश्वविद्यालयों में आकर ज्ञान प्राप्त करते रहे हैं।विदेशी शासन के बाद इस स्थिति में परिवर्तन हुआ और हम अपनी राजनैतिक सीमाओं में सिमट गए। भारत के विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों के प्रवेश की भी अत्यंत सीमित संभावना अभी तक थी। शिक्षा नीति में इसे प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है। (12.7) भारतीय शिक्षण मंडल इसका स्वागत करता है। नीति में विश्व के सर्वोत्तम 100 विश्वविद्यालयों को भारत में अपने प्रांगण (Campus) खोलने की अनुमति प्रदान करने की बात की है तथा इस हेतु विशेष विधिक प्रावधान बनाए जाएंगे। विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आने पर कोई आपत्ति नहीं है। अधिनियमों में यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि उन्हें कोई विशेष सुविधाएं प्रदान नहीं की जाएंगी। जो विधि अथवा कानून भारतीय विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं, उन्हीं के द्वारा यह विदेशी संस्थान संचालित किए जाएँ। वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेशों में शिक्षा देने का अधिकार नहीं है। विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत में स्वागत करने के साथ ही भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेशों में प्रांगण खोलने हेतु प्रोत्साहित करने का प्रावधान भी नीति में किया गया है। (12.8)

14.  समग्र पाठ्यक्रम – उच्च शालेय स्तर से प्रारम्भ कर उच्च शिक्षा तक सभी वर्ष विशेष विषयों के साथ ही आधे अंकों का समग्र पाठ्यक्रम (Holistic Course) अनिवार्य किया गया है। (11.1) यह शिक्षा की समग्रता के लिए आवश्यक है। चाहे जिस भी विषय के विशेषज्ञ हमें बनाने हो कुछ मूलभूत बातें सभी के लिए अनिवार्य होती है। देश का इतिहास, भूगोल, उसकी परंपराओं का ज्ञान, साथ ही सामान्य नागरिक नियम - जैसे सड़क पर कैसे चला जाएं, स्वच्छता के नियम आदि का भी शिक्षा के औपचारिक रूप में प्रावधान होना आवश्यक है। समय का मूल्य, समय का नियोजन, कठोर समयपालन जैसे विषय भी इस समग्र पाठ्यक्रम का अंग बनने चाहिए। पर्यावरण के प्रति सजगता, सामान्य वित्तीय अनुशासन, बैंक आदि के व्यवहार के बारे में भी जानकारी क्रमशः अधिक प्रगत रूप में समग्र पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जा सकती है।

15.  भारत बोध पाठ्यक्रम – ‘भारत का ज्ञान’ के अंतर्गत देश के सांस्कृतिक आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में पाठ्यक्रम की बात भी शिक्षा नीति में की गई है। (4.27) वर्तमान में उत्तर प्रदेश में ‘राष्ट्र गौरव’ नाम से इस प्रकार की पुस्तक शालेय स्तर पर पाठ्यक्रम का अंग है। शिक्षा नीति में भारत की ज्ञान परंपरा, गौरव बिंदु, वैज्ञानिक दृष्टि आदि को सम्मिलित कर एक भारत बोध पाठ्यक्रम हर स्तर पर समाविष्ट करने का प्रावधान है। आवश्यकता है कि इस बीज बिंदु पर तुरंत कार्य करें। ऐसा क्रमिक पाठ्यक्रम तैयार किया जाएं ताकि प्राथमिक शिक्षा से ही अर्थात कक्षा एक से ही परास्नातक (post-graduation) तक भारत के बारे में पूरी जानकारी विद्यार्थियों को प्रदान की जा सकें। (परिचय, पृ.4)

16.  पारदर्शी गुणवत्तापूर्ण व्यवस्थापन – व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (Professional courses)के नियमन हेतु बने - MCI, ICAR, BCI जैसी संस्थाएं वर्तमान शिक्षा क्षेत्र के व्यापार और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गई है। शिक्षा नीति में इन संस्थाओं की भूमिका में पूर्ण परिवर्तन का प्रावधान है। ये संस्थाएं व्यावसायिक मानक निर्धारण संस्था (professional standards setting body – PSSB) बनेंगी, नियंत्रक नहीं। अध्ययन पूर्ण होने के बाद गुणवत्ता निर्धारण हेतु CA Associationके समान एक सामान्य उत्तीर्ण परीक्षा (Common Exit Exam) ले सकती है। (18.7)

17.  उद्योग का सहभाग – वित्त विपुलता हेतु आर्थिक योगदान के साथ ही शैक्षिक रूप से भी उद्योग जगत का सहभाग शिक्षा में हो ऐसी योजना इस नीति में है। पाठ्यक्रम निर्धारण, अनुसंधान तथा शिक्षकों को कार्यानुभव जैसे उपायों से उद्योग जगत को शैक्षिक गतिविधि में भागीदार बनाकर उच्च शिक्षा को अधिक व्यावहारिक बनाया जा सकता है। (16.6-16.8) उच्च शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति में भी उद्योग अनुभव को शैक्षिक अनुभव के बराबर का स्थान दिया गया है। इससे उद्योग का प्रत्यक्ष अनुभवप्राप्त लोग भी अध्यापक बन सकेंगे। ऐसे अध्यापक अधिक परिणामकारी सिद्ध होंगे।

18.  कला और सामाजिक विषय के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान – कला, साहित्य में रुचि होते हुए भी केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण अनेक छात्र IIT में प्रवेश लेते हैं। मौलिक विज्ञान के प्रति छात्रों का रुझान बढ़ाने हेतु 10-15 वर्ष पूर्व ISER, NISER जैसी संस्थाओं का प्रारम्भ किया गया। इस शिक्षा नीति में कला तथा भाषा के क्षेत्र में इस प्रकार के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। अनुवाद के लिए Indian Institute of Translation & Interpretation - IITI (22.14) प्रारंभ किए जाएंगे। समग्र एवं बहुआयामी शिक्षा के लिए आदर्श ‘बहुविषयक शिक्षा एवं शोध विश्वविद्यालय – Multi-Disciplinary Education & Research University (MERU)’ की स्थापना की जाएगी। (11.11)

इसी प्रकार सामाजिक शास्त्र के लिए Indian Institute of Social Sciences - IISS तथा भाषा के लिए Indian Institute of Languages & Linguistics - IILL तथा कलाओं के लिए Indian Institute of Liberal Arts - IILA का भी विचार किया जाना चाहिए। खेल तथा युद्ध विद्या के लिए भी राष्ट्रीय महत्व के संस्थान खोले जाने चाहिए ताकि प्रतिभा के अनुसार प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा का चयन विकल्प हर मेधावी छात्र के पास हो।

19. भारत केंद्रित – इस शिक्षा नीति की विशेषता है कि इस में सभी स्तरों पर भारत को केंद्र में रखा गया है। (पृ. सं. 8, नीति का विज़न) भारत की परिस्थितियों के अनुसार नीतियों का प्रावधान है। वैश्विक स्तर तथा प्रतिस्पर्धा की चर्चा तो है किंतु विश्व में स्थान प्राप्त करने के लिए अंधानुकरण की बात नहीं की है। वैश्विक बातों को देशानुकूल कर स्वीकार करने की सम्भावना नीति में है। क्रियान्वयन के समय इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। सभी विद्याशाखाओं के संदर्भीकरण की आज नितांत आवश्यकता है। इस में चिकित्सा शिक्षा के बारे में विस्तृत योजना दी है, जो भारत की परिस्थिति के अनुरूप है। (20.5) जैसे ज़िला स्तर के प्रत्येक चिकित्सालय को शिक्षा केंद्र बनाने की बात है जिससे पर्याप्त संख्या में आवश्यक चिकित्सकों का निर्माण किया जा सकें। योग, आयुर्वेद आदि भारत की पारंपरिक चिकित्सा विधियों को आयुष (AYUSH) का भी चिकित्सा शिक्षा में सभी स्तरों पर अंतर्भाव किया जाएगा। ग्रामीण शिक्षकों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उस हेतु विशेष प्रावधान किया गया है। (5.2) भारत की विशिष्ट परिस्थिति को देखते हुए समाज के सभी वर्गों को शिक्षा के अवसर प्रदान कर सामाजिक समरसता हेतु अनेक क्रांतिकारी एवं व्यावहारिक उपाय नीति में दिए गए हैं। (14.1-14.4)

ऐसी भारत के लिए विशिष्ट अनेक बातें इस शिक्षा नीति में दी गई है। यदि सही पद्धति से क्रियान्वयन किया जाएँ तो यह क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।

लेखक : मुकुल कानिटकर, अखिल भारतीय संगठन मंत्री, भारतीय शिक्षण मंडल

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