कौतुहल और जिज्ञासा में अन्तर

Life Development May 23, 2021

लेखक - श्री विनय झा

किसी विषय को सीखने की योग्यता की दो पूर्वशर्तें हैं — मेधा और जिज्ञासा । कौतुहल उस योग्यता में बाधक है क्योंकि कौतुहल मन का विचलन है । माया के कौतुकों का आकर्षण ही कौतुहल है । माया से वैराग्य लेकर सच्चे ज्ञान को पाने की ईच्छा ही जिज्ञासा है । मेधा मन की स्थिरता (योग) से प्राप्त होती है और तब सही जिज्ञासा उत्पन्न होती है । मन का विचलन वासनाओं का प्रतिफल है । पूर्वकर्मों द्वारा जनित अनन्त वासनायें ही कौतुहल पैदा करती हैं । मन की स्थिरता की पहली शर्त है एक वर्ष का अखण्ड ब्रह्मचर्य (एक वत्सर में ब्रह्म का वत्स बनने की योग्यता मिलती है) । ब्रह्मचर्य मूर्ख को भी मेधावी बना देता है । किन्तु मूर्ख को ब्रह्मचर्य का लाभ ईश्वर भी नहीं समझा सकते,जबतक ठोकर खाकर स्वयं समझने का सच्चा प्रयास न करे ।

मेधा मेध से उत्पन्न होती है,देव को हवि का अशन करा सके ऐसे द्रुत (अश्)  निर्बाध यज्ञ ( = मेध) को अश्वमेध कहते हैं ।( बृहदारण्यकोपनिषद् के अनुसार अश्वमेध का वह अश्व सर्वव्यापी ब्रह्म है । अश्वमेध का यह अर्थ महर्षि याज्ञवल्क्य का है । सायणाचार्य ने अश्वमेध का अर्थ रावण के मायावी दुष्ट भाष्य से लिया था क्योंकि सायण को पता नहीं था कि रावण ने कितनी धूर्तता से वेदभाष्य में आसुरी कलुष जोड़ा । आज भी हमारे संस्कृत विषविद्यालयों में अलग−अलग नामों से रावणभाष्य ही पढ़ाया जाता है जिसमें गोवध,नरवध और अश्व के साथ रानी का यौन सम्बन्ध जैसी अश्लील और धर्मविरोधी बकवास हमारे वैदिक पढ़ाते हैं । सम्पूर्ण महायुग में रावण जैसा तीव्रबुद्धि धूर्त न हुआ और न होगा ।

ज्ञान का अन्त नहीं,अतः ब्रह्म के सिवा कोई ज्ञानी नहीं । ऋग्वेद में उसे नेति नेति कहा गया । जहाँ ज्ञान का पड़ाव आ जाय वहीं से मूर्खता आरम्भ होती है । मूर्खता का आरम्भ है कौतुहल,जो द्वार है अन्य समस्त पापों का ।

वैदिक दर्शनों,विशेषतया योगदर्शन,की शास्त्रीय शब्दावली में समाधि से भिन्न अवस्था को व्युत्थान कहते हैं जिसके अनेक भेद हैं । ऐन्द्रिक जगत के कौतुकों में चित्त का भटकाव कौतुहल है जो व्युत्थान के अनेक भेदों में से एक है । उपनिषदों के अनुसार चित्त की पचास प्रवृत्तियाँ हैं जिन सबके नाम उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि बहुत से प्राचीन ग्रन्थ अब नहीं मिलते । पचास प्रवृत्तियों में से प्रमुख क्लिष्ट मलों के नाम योगसूत्र में हैं किन्तु क्लिष्ट मलों में कौतुहल नहीं आता । अतः योगदर्शन की भावना को ध्यान में रखकर कौतुहल को भटकाव का आरम्भ मैंने कहा है जिसमें विपरीत अश्वत्थवृक्षरूपी संसार के मूल ब्रह्म की ओर न होकर विपरीत उत्थान अर्थात् ऐन्द्रिक फुनगियों की ओर व्युत्थान आरम्भ होता है । ब्रह्म की ओर प्रवृति का आरम्भ जिज्ञासा है,उससे विपरीत प्रवृति व्युत्थान है जिसका आरम्भ कौतुहल है ।

प्रारब्ध के पाश से जो बँधा रहे उसे पशु कहते हैं,जिसका मन उदित (उष्) हो वह मनुष्य है । पाश तोड़ने का साधन है पुरुषार्थ जिसका क्रम है धर्म,फिर अर्थ,तब काम,और अन्ततः मोक्ष । कुछ मूर्ख अर्थ लगाते हैं कि चारों की पूर्ति अनिवार्य है । ब्रह्मसूत्र का आदेश है कि वैराग्य उत्पन्न होते ही संन्यास ले लेना चाहिये । मन में वैराग्य हो तो गृहस्थ बने रहना मूर्खता ही नहीं ,पाप है । वैराग्य न हो तो संन्यास लेना पाप है ।ज्ञान का लक्ष्य मोक्ष है । जिस किसी कर्म वा अवस्था का लक्ष्य मोक्ष नहीं वह अविद्या है । धर्म (यज्ञ) भी अविद्या है । किन्तु कर्मकाण्डरूपी धर्म द्वारा ही मोक्ष के द्वार को खोला जा सकता है । प्राणायाम आदि भी कर्मकाण्ड के अङ्ग हैं । शतपथ ब्राह्मण का आदेश है कि यज्ञ आरम्भ होते ही यजमान संकल्प ले कि मनुष्य असत् है और देवता सत्,अतः यज्ञ समाप्त होने तक यजमान देवत्व में स्थित रहेगा ।

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