हम जिन पुराणों को जानते हैं, वे पुराण नहीं हैं

Politics of Education Apr 16, 2021

[यह खासा विवादास्पद लेख है, खुल कर इसकी कमियों पर तटस्थ भाव से अपना मत रखें - श्री भगवान सिंह ]

हम जिन पुराणों को जानते हैं, वे पुराण नहीं हैं ।   इनमें पुराणों का कुछ अंश अवश्य है जिसकी विश्वसनीयता असंदिग्ध है, परन्तु उस सामग्री में नई जरूरतों से बहुत कुछ मिलाया गया है। पुराण यदि इतिहास हैं, तो अठारह तरह के नहीं हो सकते।  इन महापुराणों में कुछ बातें अक्षरशः दुहराई गई हैं। इससे यह पता चलता है, कि एक ही मूल  रचना का  विभिन्न संप्रदायों ने अपने ढंग  से  प्रयोग किया है।  विष्णु पुराण  में इसका खुलासा भी किया गया है।   व्यास मुनि ने आख्यानों उपाख्यानों, गाथाओं,  कल्पों और मन्वंतरों के आय़ार पर एक पुराण संहिता संहिता तैयार की।  इसे उन्होंने अपने प्रतिभाशाली शिष्य लोमहर्षण को सुनाया, जो सूत थे। इनके सुमति, अग्निवर्चस्, मित्रायु, शंसपायन,  अकृतवर्ण (काश्यप) और सावर्णि नाम के छह शिष्य थे।  इनमें से अंतिम तीन ने तीन संहिताओं की रचना की, रोमहर्षण ने रोमहर्षणिक संहिता की रचना की। इन चारों के आधार पर अठारह पुराणों की रचना हुई:

आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैः गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः।
पुराण संहितां चक्रे पुराणार्थविशारदः।।
प्रख्यातो व्यासशिष्योभूत् सूतो  वै रोमहर्षणः
पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामतिः।।
सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च मित्रायुः शांसपायनः
अकृतवर्ण सावर्णी षट् शिष्यास्तस्य चाभवन्।।
काश्यपः संहिताकर्ता सावर्णिश्सांसपायनः।
रोमहर्षणिका चान्या तिसृणां मूलसंहिता।।
चतुष्टयेन भेदेन संहितानां इदं मुने।
आद्यं सर्वपुराणानां पुराणं ब्राह्मं उच्यते।
अष्टादश पुराणानि पुराणज्ञाः प्रचक्षते।।  वि.पु.  3.6.15-20  

और इस तरह एक ही मूल पुराण अठारह में बट गया या कहें मूल को अठारह  आग्रहों से तोड़ मरोड़ और जोड़-घटा कर बदला गया और इस तरह इसकी ऐतिहासिकता को क्षति पहुंचाई गई। इन सभी के द्वारा  विविध पुराणों को ज्ञानकोश बनाने का प्रयत्न किया गया।इनकी रचना ठीक उसी काल में हुई जब ब्राह्मण (देववादी) अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे।  संभव है  इनको इतना आडंबर पूर्ण इसलिए बनाया गया कि तब तक बुद्ध के पूर्व जन्मों को लेकर जातक कथाएं लोक में प्रचलित हो गई थीं। दावा  किया जाता है कि ब्राह्मणों ने तो बुद्ध को भी पूरा सम्मान दिया और उन्हें विष्णु का अवतार माना। पर सच्चाई यह लगती है कि विष्णु के अवतारों कल्पना ही बौद्धमत के प्रतिवाद  में की गई। बुद्ध को उनके अनुयायी भगवा, भगवान् (भन्ते) कह कर संबोधित करते हैं इससे पहले विष्णु का एक ही रूप वामन (वामनो ह विष्णु आस) है, पर यह अवतार नहीं है, एक विशेष प्रयोजन के लिए रूप धारण करना या अपने लघुतम रूप (आग का चिनगारी के रूप में) उपस्थित होना है।

पहले देवता आमंत्रित होते और स्वयं उपस्थित होते या मान लिए जाते रहे हैं।  अवतारवाद जातक कथाओं के साथ आरंभ होता है।   पौराणिक अवतारवाद बोधिसत्वों की नकल है। बुद्ध अगले जन्मों में उत्तरोत्तर ऊंचे प्राणी में जन्म लेते हैं, पूर्ण ज्ञनी गौतम के रूप में बनते हैं। अवतारों में भी सभी अंशावतार हैं. कृष्ण ही पूर्ण अवतार हैं।  हाल यह कि यही तय नहीं हो पाता कि अवतार दस हैं या चौबीस। श्रीमद्भागवत में  दोनों का हवाला है।  चौबीस की संख्या के लिए पृथु, यज्ञ (सुयज्ञ), कपिल, दत्तात्रेय जैस व्यक्ति नाम भी हैं,। एक राजपुत्र को विष्णु का अवतार बनाया जा सकता है तो ऋषियों-मुनियों को क्यों नही। महत्वपूर्ण  यह है कि इस अवतार में बुद्ध मायाचारी हैं।  समाज में यज्ञविरोधी अनीश्वरवादियों की संख्या बढ़ गई थी। वे पहचान में नहीं आ रहे थे.।  इन पाखंडियों को उजागर करने के लिए विष्णु को बुद्ध का अवतार लेना पड़ा। अर्थात बुद्ध का अवतार बौद्ध धर्म के विरुद्ध और बौद्ध मत के अनुयायियों के विरुद्ध है न कि किसी उदारता का परिचायक।  बुद्ध को महाकाव्यों में चोर तक कहा गया है । "यदस्ति चोर: स त एवं बुद्ध: तथागतं नास्तिक एव विद्धि" ऐसी स्थिति में यह लगता है की अवतारों की उद्भावना आस्तिकता का भाव जगाने के लिए भी  की गई जिसमें बौद्ध और जैन मतों के अनीश्वरवादी दर्शन और योग साधना की लोकप्रियता के कारण लोगों का विश्वास समाप्त होने लगा था।

यही स्थिति यज्ञ के कर्मकांड और यज्ञ में जनसाधारण की आस्था के मामले में भी देखा जा सकता है। यज्ञ की सार्थकता के लिए नए लाभ - इससे निःसंतान को संतान  पैदा कराई जा सकती है। ऐसा लगता है कि अपने ह्रास के बाद - तंत्र साधना, हठयोग,  मंत्र सिद्धि, योगाचार आदि के द्वारा भी ब्राह्मणवाद को चुनौती दी जा रही।   शताब्दियों बाद सिद्धों, योगियों, सूफियों और संतों के आंदोलन -- कबीर पंथ, नानक पंथ, रविदासी समाज --से उत्पन्न जिस संकट का सामना करने के लिए सगुण भक्ति और अवतारवाद आदि का सहारा लेकर हिंदुत्व को पश्चगामी बनाते हुए रक्षात्मक मोर्चा तैयार किया गया (आगे खतरा देख कर गाड़ी को बैक गीयर में चलाना आत्मरक्षा का एकमात्र उपाय होता है, कुछ वैसा ही यह निर्णय था)   जिसके सबसे महान नायक तुलसीदास हैं, कुछ वैसे ही संकट का निराकरण करने के लिए पुराणों के पहले से चले आ रहे चरित्र को बदला गया और नई सामग्री जोड़ी गई। हम मत्स्य, वाराह, आदि अवतारों की उद्भावना की  आवश्यकता को तब तक नहीं समझ सकते जब तक  बोधिसत्वों पर ध्यान न दें? असल  प्रश्न  जीविका का था, जिसका प्रमुख साधन दान दक्षिणा हुआ करती थी । दान की महिमा बहुत प्राचीन अवस्था से चली आ रही थी। यह आदिम अवस्था की सब कुछ मिल बांट कर खाने का अवशेष था।

इसकी महिमा ऋग्वेद में भी है और उपनिषद के उस उपदेश में भी जिसमें यश के लिए, लज्जा वश और इनसे नहीं तो अमंगल/ बदनामी के डर से भी दान देने (श्रिया देयं, ह्रिया देयं, भिया देयं)  की सलाह दी गई है। परंतु इस काल में   दुर्वासा जैसे ऋषि की कल्पना की जाती है  जो भिक्षा मिलने में तनिक भी विलंब या असावधानी या अवज्ञा  होने पर ऐसा शाप दे सकते हैं जिससे वह स्वयं भी चाहे तो उद्धार न हो।   दूसरा यदि असावधानी में,  विनोद वश, यहां तक कि सपने में भी किसा ब्राह्मण को कुछ देने का वादा कर दिया तो उसे देना ही चाहिए।  इसे प्रोत्साहित करने के लिए दानवीरों की ऐसी कहानियों की सृष्टि होती है जिनसे किसी की सदाशयता का संकेत नहीं मिलता,  दानी की मूर्खता और ब्राह्मणों की क्रूरता  अवश्य दिखाई देती है। उस क्रूरता के पीछे ब्राह्मण के आर्थिक संकट ( बुभुक्षितः किं न करोति पापम्) को स्पष्ट देखा जा सकता है।  आपने गुप्त जी की उन पंक्तियों को अवश्य पढ़ा होगा:क्षुधार्त रतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।

उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म भी दिया।अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥मुझे ऐसी पंक्तियां और ऐसे आदर्श कभी प्रेरित न कर सके, न लगा कि इन पर गर्व  किया जा सकता है।इन कथाओं के रचयिताओं को इसका बोध था कि इस तरह की याचना अनैतिक है, परंतु वे इसका दुहरा प्रयोग कर रहे थे। इनमें अनिवार्य रूप से विश्वामित्र को पात्र बनाया जाता है, विश्वामित्र की क्रूरता, अहंकार और अनैतिकता सिद्ध करने के लिए एक कारखाना ही खोल दिया गया था। वह कच्चे साधक हैं और साधना के दौर में मेनका के चक्कर में आ जाते हैं और उससे उत्पन्न अपनी संतान की चिंता तक नहीं करते। वह वशिष्ट जी शबला/नन्दिनी को बलपूर्वक छीन लेना चाहते हैं ।

वह कामधेनु की पुत्री और वशिष्ठ की सेवा में अर्पित गाय होने के कारण असाधारण शक्ति रखती है और अपने विभिन्न अंगों से उन आक्रमणकारियों को पैदा करती है जिनका नाम सुनने पर दुनिया के सभी सभ्य त्राहि-त्राहि करने लगते थे। उन के माध्यम से वह विश्वामित्र की सेना को पराजित कर देते हैं--सिद्ध यह करना है कि ब्राम्हण की शक्ति के सामने क्षत्रिय की शक्ति की कोई औकात नहीं--धिग्बलं  क्षत्रिय बदन, ब्रह्म तेजो बदन बलम् --- और इसे कहानियां कर कर सिद्ध कर दिया जाता है। संभव है इसे व्यावहारिक रूप भी दिया गया हो । हमारा तात्पर्य यहां पर यह है की इसमें अनर्गल ता की चिंता नहीं की जाती विश्वामित्र राजा भी हैं और  अकाल में भूख से सबसे अधिक पीड़ित भी, याचक भी और सैन्य बल का प्रयोग करने वाले उद्दंड भी।

बौद्ध और जैन मतों के कारण जैसी घोर विपदा से ब्राह्मणों को गुजर ना पड़ा था, उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते या कर सकते हैं तो इन कहानियों और गहरे जमी हुई उस जुगुप्सा से जिसे संदर्भ से काटकर देखा जाए तो एक दूसरी तस्वीर सामने आएगी और ब्राह्मण सचमुच दुनिया का सबसे दुष्ट प्राणी सिद्ध होगा, जैसा सिद्ध करने की आजकल कोशिश भी की जा रही है।इन सीमाओं के बावजूद इन पुराणों में भी इतिहास की ऐसी महत्वपूर्ण सूचनाएं हैं जो किसी अन्य देश के पुराण में नहीं मिलतीं। नकारात्मक पक्ष से सामाजिक आर्थिक, वैचारिक इतिहास की एक तरह की सूचना मिलती है  और इनमें आए पौराणिक तथ्यों से एक दूसरे तरह का इतिहास बनता है जिसका सबसे रोचक विश्लेषण पार्जिटर ने Indian historical tradition, 1922 में किया था। पर इस पर अगली कड़ी में ही बैत की जा सकती है।

लेखक श्री भगवान सिंह
श्री भगवान सिंह - लेखक। साहित्य के अतिरिक्त वैदिक अध्ययन, भाषा, इतिहास, संस्कृति पर अनुसंंधान और लेखन।

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